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बिलासपुर में फर्जी पत्रकारों के खिलाफ प्रेस क्लब का हल्ला बोल, 200-500 रुपये के कथित खेल ने पत्रकारिता की साख पर उठाए सवाल

बिलासपुर में फर्जी पत्रकारों के खिलाफ प्रेस क्लब का हल्ला बोल, 200-500 रुपये के कथित खेल ने पत्रकारिता की साख पर उठाए सवाल


दिवाली के बीच पत्रकारिता जगत में मचा घमासान, कथित वसूली करने वालों की पहचान और नाम सार्वजनिक करने की उठी मांग; बड़े मीडिया संस्थानों से जुड़े लोगों की भी होगी जांच?

बिलासपुर। शहर में इन दिनों पत्रकारिता की साख और फर्जी पत्रकारों की पहचान को लेकर नई बहस छिड़ गई है। बिलासपुर प्रेस क्लब ने कथित फर्जी पत्रकारों के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए प्रशासन के सामने यह मुद्दा उठाया है। आरोप है कि कुछ लोग पत्रकारिता की आड़ लेकर कथित तौर पर 200 से 500 रुपये तक के लेन-देन और वसूली जैसी गतिविधियों में शामिल हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।

सालभर मेहनत करके खबरें जुटाने, जनहित के मुद्दों को उठाने और कई बार जोखिम के बीच काम करने वाले वास्तविक पत्रकारों के लिए यह स्थिति चिंता का विषय बनती जा रही है। सवाल उठ रहा है कि आखिर कुछ कथित लोगों की गतिविधियों का खामियाजा पूरी पत्रकार बिरादरी को क्यों भुगतना पड़े?

ग्रामीण क्षेत्रों से आकर पत्रकार बनने वालों की होगी पहचान?

इस पूरे मामले में एक बड़ा सवाल यह भी है कि शहर में पत्रकारिता करने वाले लोगों की वास्तविक पहचान और उनके मीडिया संस्थानों से जुड़ाव की जांच कैसे होगी? कौन किस मीडिया संस्थान का प्रतिनिधि है, किसके पास अधिकृत पहचान पत्र है और कौन केवल पत्रकारिता का परिचय देकर अधिकारियों एवं आम लोगों के बीच अपनी धाक जमाने की कोशिश कर रहा है?

ग्रामीण इलाकों से बिलासपुर पहुंचकर पत्रकारिता के नाम पर सक्रिय कुछ लोगों को लेकर भी चर्चाएं सामने आ रही हैं। कथित वसूली, छोटे-मोटे लेन-देन और ढोलक वाली मंडली को लेकर उठ रही चर्चाओं ने मामले को और गरमा दिया है। हालांकि किसी व्यक्ति को बिना प्रमाण फर्जी पत्रकार या वसूली में शामिल बताना उचित नहीं होगा। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच जरूरी है।

प्रेस क्लब के सामने 'अपोजिशन' कौन?

मामले में उस समय एक नया सवाल खड़ा हो गया, जब प्रेस क्लब के पदाधिकारी अपनी मांगों को लेकर अधिकारियों को ज्ञापन सौंपने पहुंचे। बताया जा रहा है कि बातचीत के दौरान एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि आपकी बात का 'अपोजिशन' भी आएगा।

इसके बाद सवाल उठने लगा कि जब बिलासपुर में प्रेस क्लब एक है, तो यह अपोजिशन कौन है? क्या पत्रकारिता जगत के भीतर ही अलग-अलग गुट सक्रिय हैं या फिर इस मुद्दे पर कोई दूसरा पक्ष भी अपनी बात रखने वाला है? यह स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए।

आखिर कथित वसूली करने वालों की सूची किसके पास?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पत्रकारिता की आड़ में कथित तौर पर अवैध गतिविधियां करने वालों की पहचान कौन करेगा? क्या प्रेस क्लब के पास ऐसे लोगों की कोई सूची है? क्या संबंधित मीडिया संस्थानों को अपने प्रतिनिधियों की गतिविधियों की जानकारी है? और यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ वसूली की शिकायत है तो अब तक उस पर ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

प्रेस क्लब और प्रशासन दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि शिकायतों को गंभीरता से लें और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई सुनिश्चित करें।

बड़े मीडिया समूहों से जुड़े लोगों के नाम भी आएंगे सामने?

इस मामले को लेकर अब एक और महत्वपूर्ण बात सामने आ रही है। कथित वसूली के मामले में जांच केवल छोटे या स्थानीय मीडिया संस्थानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि किसी बड़े मीडिया समूह से जुड़ा व्यक्ति भी ऐसी गतिविधियों में शामिल पाया जाता है, तो उसके खिलाफ भी निष्पक्ष जांच और नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

अब सवाल सिर्फ फर्जी पत्रकारों की पहचान का नहीं, बल्कि पत्रकारिता की गरिमा बचाने का है। कथित वसूली गैंग का खुलासा तथ्यों और सबूतों के आधार पर नामजद तरीके से होना चाहिए, चाहे मामला किसी छोटे संस्थान से जुड़ा हो या किसी बड़े मीडिया समूह से।

पत्रकारिता कोई 200-500 रुपये जुटाने का जरिया नहीं, बल्कि जनता की आवाज बनने और सत्ता से सवाल पूछने की जिम्मेदारी है। अब देखना होगा कि प्रेस क्लब की इस पहल के बाद प्रशासन कितनी गंभीरता दिखाता है और पत्रकारिता के नाम पर गलत गतिविधियां करने वालों की पहचान कब तक सामने आती है।

क्योंकि पत्रकार की पहचान उसके प्रेस कार्ड से नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्षता, विश्वसनीयता और काम से होती है।


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