ADD US AS A PREFERRED SOURCE
Follow Us On Google News Join my WhatsApp group

जब गलियों में खेलते थे बच्चे, आंगन में बसता था परिवार… आज लग्जरी जिंदगी के बीच रिश्ते क्यों बिखर रहे हैं?

POWER NEWS 24 BHARAT | विशेष लेख

बदलता बचपन, मोबाइल के आदी बच्चे और बिखरते रिश्ते: लग्जरी जिंदगी के बीच कहां खो गया परिवार का प्यार?

लेखक: Dulal Mukherjee

कभी गलियों में गूंजती थीं बच्चों की किलकारियां, मैदानों में दिखाई देता था खेल का जुनून और घरों में दादा-दादी की कहानियां सुनने के लिए बच्चे उनके पास बैठा करते थे। आज अनेक घरों में बच्चों के हाथ में मोबाइल है, परिवार के सदस्य अपनी-अपनी स्क्रीन में व्यस्त हैं और बातचीत के लिए समय कम होता जा रहा है। आखिर आधुनिकता की दौड़ में बचपन, संस्कार और अपनों के साथ बिताया जाने वाला समय कहां खोता जा रहा है?

1. पहले का बचपन: खेल, दोस्ती और खुला मैदान

पहले स्कूल से लौटने के बाद बच्चे दोस्तों के साथ खेलने निकल जाते थे। गांवों, कस्बों और मोहल्लों में गिल्ली-डंडा, कबड्डी, खो-खो, कंचे, पिट्ठू, लंगड़ी और छुपन-छुपाई जैसे खेल बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा थे। खेल में जीत-हार होती थी, कभी बहस भी होती थी, लेकिन कुछ समय बाद बच्चे फिर साथ खेलने लगते थे।

इन खेलों में बच्चों को दौड़ने, निर्णय लेने, नियम समझने, अपनी बारी का इंतजार करने और टीम के साथ तालमेल बनाने का अवसर मिलता था। आज भी अनेक जगह बच्चे पारंपरिक खेल खेलते हैं, लेकिन कई इलाकों में खुले मैदानों की कमी, व्यस्त जीवनशैली और डिजिटल मनोरंजन की बढ़ती उपलब्धता के कारण खेल का तरीका बदल गया है।

2. गिल्ली-डंडा: कम सामान में भरपूर मनोरंजन

गिल्ली-डंडा खेल की तस्वीर
गिल्ली-डंडा — भारतीय पारंपरिक खेल। फोटो स्रोत: Wikimedia Commons

गिल्ली-डंडा भारतीय ग्रामीण जीवन से जुड़ा पारंपरिक खेल है। इसे खेलने के लिए महंगे उपकरणों की जरूरत नहीं होती। बच्चे निशाना लगाना, दूरी का अनुमान लगाना और नियमों का पालन करना सीखते हैं। इस तरह के खेल बच्चों को सक्रिय रहने और दोस्तों के साथ समय बिताने का अवसर देते हैं।

3. कबड्डी: साहस, फुर्ती और टीम भावना

मैदान में कबड्डी खेलते विद्यार्थी
कबड्डी खेलते विद्यार्थी। फोटो स्रोत: Wikimedia Commons

कबड्डी भारत का लोकप्रिय पारंपरिक खेल है। इसमें शारीरिक क्षमता के साथ रणनीति, फुर्ती और टीम के साथ तालमेल जरूरी होता है। स्कूलों और स्थानीय खेल आयोजनों में कबड्डी बच्चों को अनुशासन, सहयोग और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का अनुभव दे सकती है।

4. खो-खो: तेजी और समझदारी का खेल

भारत के स्कूल में खो-खो खेलते बच्चे
स्कूल में खो-खो का खेल। फोटो स्रोत: Wikimedia Commons

खो-खो में तेजी से दिशा बदलना, सही समय पर निर्णय लेना और साथियों के साथ तालमेल रखना महत्वपूर्ण होता है। स्कूलों में खेलकूद के अवसर बढ़ाकर बच्चों को इस तरह के पारंपरिक खेलों से जोड़ा जा सकता है।

5. कंचे: निशाना, धैर्य और दोस्ती

गुजरात के गांव में कंचे खेलता बच्चा
कंचे खेलता बच्चा। फोटो स्रोत: Wikimedia Commons

कंचे खेलने के लिए बहुत कम सामान चाहिए। बच्चे जमीन पर निशाना साधते, अपनी बारी का इंतजार करते और खेल के नियम बनाते थे। यह छोटा-सा खेल बचपन की अनेक यादों से जुड़ा रहा है। आज भी सुरक्षित जगह पर बच्चों को ऐसे खेलों से परिचित कराया जा सकता है।

6. पिट्ठू: सात पत्थरों का पारंपरिक खेल

पिट्ठू या सात पत्थरों का पारंपरिक खेल
पिट्ठू — भारतीय पारंपरिक खेल। फोटो स्रोत: Wikimedia Commons

पिट्ठू, जिसे कई जगह सात पत्थरों का खेल भी कहा जाता है, बच्चों के बीच लोकप्रिय रहा है। इसमें पत्थरों को जमाना, गेंद से उन्हें गिराना और फिर अपनी टीम के साथ उन्हें दोबारा जमाने की कोशिश करना शामिल होता है। यह खेल बच्चों को दौड़ने, रणनीति बनाने और मिलकर खेलने का अवसर देता है।

7. पतंगबाजी: आसमान में उड़ते सपने

पतंगबाजी से जुड़ी प्रतीकात्मक तस्वीर
पतंगबाजी और खुले आसमान की यादें — प्रतीकात्मक तस्वीर। यदि यह फोटो उपलब्ध न हो तो ऊपर दिए Wikimedia स्रोत से दूसरी तस्वीर चुनें।

पतंग उड़ाना अनेक भारतीय क्षेत्रों में त्योहारों और मेल-जोल से जुड़ी परंपरा है। बच्चे पतंग उड़ाना सीखते थे और परिवार के सदस्य एक साथ समय बिताते थे। पतंगबाजी के दौरान बिजली के तारों, ऊंची छतों और खतरनाक मांझे से दूर रहना जरूरी है।

8. मोबाइल में सिमटता बचपन

डिजिटल डिवाइस के इस्तेमाल की प्रतीकात्मक तस्वीर
डिजिटल स्क्रीन का बढ़ता इस्तेमाल — प्रतीकात्मक तस्वीर।

स्मार्टफोन ने शिक्षा, जानकारी और संचार को आसान बनाया है। ऑनलाइन पढ़ाई और उपयोगी शैक्षणिक सामग्री बच्चों की मदद कर सकती है। लेकिन जब स्क्रीन का समय लगातार बढ़ने लगे और नींद, पढ़ाई, शारीरिक गतिविधि तथा परिवार के साथ बातचीत के लिए समय कम होने लगे, तो इस आदत पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है।

कुछ बच्चे बार-बार वीडियो देखने या गेम खेलने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि बाहर खेलने और दूसरे कामों में रुचि कम होने लगती है। हर बच्चे की स्थिति अलग होती है, इसलिए डांटने के बजाय उसके व्यवहार, दिनचर्या और जरूरतों को समझना चाहिए।

9. माता-पिता का प्यार और बच्चों को मिलने वाला समय

माता-पिता और बच्चों के रिश्ते से जुड़ी प्रतीकात्मक तस्वीर
बच्चों के विकास में स्नेह और साथ बिताया समय महत्वपूर्ण है — प्रतीकात्मक तस्वीर।

माता-पिता बच्चों के भविष्य के लिए मेहनत करते हैं। अच्छी शिक्षा, बेहतर सुविधाएं और सुरक्षित जीवन देना चाहते हैं। लेकिन बच्चों को केवल वस्तुओं और सुविधाओं की जरूरत नहीं होती। उन्हें बातचीत, स्नेह, प्रोत्साहन और भावनात्मक सहारे की भी जरूरत होती है।

जब घर के बड़े काम या मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, तो बच्चों को अपनी बात कहने के अवसर कम मिल सकते हैं। रोज कुछ समय बच्चे की बातें सुनने, उसके स्कूल और दोस्तों के बारे में पूछने और उसके साथ खेलने से परिवार का जुड़ाव मजबूत हो सकता है।

10. सफर में भी साथ, लेकिन बातचीत कम

पहले लंबी रेल या बस यात्रा में परिवार के सदस्य कहानियां सुनाते, अंताक्षरी खेलते और आसपास के नजारे देखते थे। आज कई यात्राओं में लोग अपने-अपने फोन में व्यस्त रहते हैं। मोबाइल उपयोगी है, लेकिन साथ बैठकर भी एक-दूसरे से बात न करना परिवार के साथ बिताए समय को सीमित कर सकता है।

यात्रा के दौरान कुछ समय स्क्रीन से दूर रहकर बातचीत करना, बच्चों को आसपास की जगहों के बारे में बताना और साथ में खेल खेलना अच्छा विकल्प हो सकता है।

11. लग्जरी जिंदगी और बढ़ती अपेक्षाएं

आधुनिक घर और जीवनशैली की प्रतीकात्मक तस्वीर
आधुनिक जीवनशैली — प्रतीकात्मक तस्वीर।

आधुनिक जीवन ने अनेक सुविधाएं दी हैं। बेहतर घर, वाहन, घरेलू उपकरण और डिजिटल सेवाएं जीवन को आसान बना सकती हैं। लेकिन जब सफलता को केवल महंगी वस्तुओं, ब्रांडेड कपड़ों और दूसरों से आगे निकलने से मापा जाता है, तो परिवार पर आर्थिक और मानसिक दबाव बढ़ सकता है।

बच्चों को समझाना जरूरी है कि किसी व्यक्ति का मूल्य उसके मोबाइल, कपड़ों या आर्थिक स्थिति से तय नहीं होता। परिवार के बीच सम्मान और भरोसा महंगी वस्तुओं से अधिक महत्वपूर्ण हैं।

12. डिजिटल भुगतान और साइबर अपराध का खतरा

UPI और डिजिटल बैंकिंग ने पैसे भेजना और बिल चुकाना आसान किया है। साथ ही फर्जी लिंक, नकली ग्राहक सेवा नंबर और OTP या UPI PIN मांगने वाले ठग भी लोगों को निशाना बना सकते हैं। बच्चों और बुजुर्गों को डिजिटल सुरक्षा की जानकारी देना जरूरी है।

अपना OTP, UPI PIN या पासवर्ड किसी के साथ साझा न करें। अनजान लिंक पर क्लिक करने से बचें। ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी होने पर तुरंत बैंक से संपर्क करें और साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर सूचना दें। आधिकारिक शिकायत पोर्टल: cybercrime.gov.in.

13. संयुक्त परिवार और बदलते रिश्ते

परिवार के साथ समय बिताने की प्रतीकात्मक तस्वीर
परिवार के साथ बिताए पल — प्रतीकात्मक तस्वीर।

संयुक्त परिवारों में कई पीढ़ियां एक साथ रहती थीं। दादा-दादी बच्चों को कहानियां सुनाते और जीवन के अनुभव साझा करते थे। आज रोजगार, शिक्षा, पलायन और आवास की परिस्थितियों के कारण अनेक परिवार अलग-अलग रहते हैं। छोटे परिवार होना अपने आप में गलत नहीं है; महत्वपूर्ण यह है कि परिवार के सदस्य एक-दूसरे से जुड़े रहें और जरूरत के समय सहयोग करें।

14. बुजुर्गों का जीवन और सम्मान

परिवार और बुजुर्गों के जुड़ाव की प्रतीकात्मक तस्वीर
बुजुर्गों को सम्मान और भावनात्मक सहारा देना महत्वपूर्ण है — प्रतीकात्मक तस्वीर।

बुजुर्ग परिवार के अनुभव और स्मृतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। उम्र बढ़ने पर उन्हें स्वास्थ्य सहायता, सुरक्षा, सम्मान और भावनात्मक सहारे की जरूरत हो सकती है। कुछ बुजुर्ग परिवार के साथ रहते हैं, कुछ अकेले और कुछ वृद्धाश्रम में। सभी की परिस्थितियां अलग होती हैं, इसलिए किसी एक उदाहरण से हर परिवार या संस्था के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।

परिवार के सदस्यों को बुजुर्गों की बातें सुननी चाहिए, उनकी जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए और उन्हें फैसलों में शामिल करना चाहिए। दूर रहने पर भी नियमित फोन या वीडियो कॉल से संपर्क बनाए रखा जा सकता है।

15. महंगाई, बेरोजगारी और काम का दबाव

बढ़ते खर्च, शिक्षा और इलाज की लागत, रोजगार की अनिश्चितता और काम के लंबे घंटे कई परिवारों के लिए चुनौती बन सकते हैं। माता-पिता बच्चों के भविष्य के लिए मेहनत करते हैं, लेकिन कई बार इसी भागदौड़ में परिवार के साथ समय बिताना कठिन हो जाता है।

ऐसे समय में खुलकर बातचीत, खर्च की योजना और जिम्मेदारियों का उचित बंटवारा उपयोगी हो सकता है। सार्वजनिक समस्याओं पर चर्चा करते समय प्रमाण, तथ्य और जिम्मेदार भाषा का इस्तेमाल भी जरूरी है।

16. मोबाइल का संतुलित इस्तेमाल कैसे हो?

  • बच्चे की उम्र और जरूरत के अनुसार स्क्रीन टाइम के नियम बनाएं।
  • खाने और सोने से पहले स्क्रीन-मुक्त समय रखने की कोशिश करें।
  • बच्चों को रोजाना बाहर खेलने और शारीरिक गतिविधि के अवसर दें।
  • गिल्ली-डंडा, कैरम, शतरंज और अन्य उम्र के अनुकूल खेलों से परिचित कराएं।
  • ऑनलाइन सुरक्षा और देखी जाने वाली सामग्री पर बच्चों से बात करें।
  • माता-पिता भी अपने मोबाइल इस्तेमाल में संतुलन रखें।
  • बच्चे की परेशानी को केवल जिद न समझें; उसकी बात सुनें।

17. स्कूल और समाज की भूमिका

स्कूलों में खेल के मैदान, पुस्तकालय, कला और सांस्कृतिक गतिविधियां बच्चों को सीखने के विविध अवसर दे सकती हैं। स्थानीय निकाय और समुदाय सुरक्षित पार्क, खेल प्रतियोगिताएं और पारंपरिक खेलों के आयोजन में योगदान दे सकते हैं। बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य सहायता, सामाजिक गतिविधियां और सम्मानजनक वातावरण भी जरूरी हैं।

निष्कर्ष: बच्चों को सिर्फ मोबाइल नहीं, अपना समय और प्यार भी दीजिए

आधुनिक तकनीक को पूरी तरह नकारना समाधान नहीं है। जरूरत है कि हम उसका उपयोग संतुलित तरीके से करें और रिश्तों के लिए समय निकालें। बच्चों को खेलने, सीखने और अपनी बात कहने के अवसर चाहिए। बुजुर्गों को सम्मान, सुरक्षा और भावनात्मक सहारा चाहिए।

परिवार के साथ बैठकर बातचीत करना, बच्चों के साथ मैदान में जाना, बुजुर्गों की बातें सुनना और कुछ समय मोबाइल अलग रख देना छोटे कदम हैं, लेकिन इनसे जुड़ाव बढ़ सकता है। बदलाव की शुरुआत घर से हो सकती है।

“बच्चों को सिर्फ मोबाइल नहीं, बचपन दीजिए। बुजुर्गों को सिर्फ घर नहीं, सम्मान दीजिए। परिवार को सिर्फ सुविधाएं नहीं, एक-दूसरे के लिए समय दीजिए।”

विशेष लेख: Dulal Mukherjee
POWER NEWS 24 BHARAT


संदर्भ और उपयोगी जानकारी

संपादकीय सूचना: कुछ तस्वीरें विषय को समझाने के लिए प्रतीकात्मक हैं। Wikimedia Commons की तस्वीरों के लिए संबंधित फाइल पेज पर लाइसेंस और श्रेय की शर्तें जांचें।

Post a Comment

0 Comments

Top Post Ad