केंद्र सरकार और राज्य सरकार के वे सारे दावे तब खोखले नजर आते हैं जब आज के समय में कोई परिवार अपने मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित है. जहां एक ओर सरकार सभी गरीब लोगों को सरकारी आवास और मुफ्त राशन देने का दावा कर रही है, वहीं धनबाद जिले के बाघमारा प्रखंड अंतर्गत फ़ाटामहुल पंचायत में दर्जनों आदिवासी परिवार बिजली, पानी, शिक्षा, आवास व राशन जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है. कतरास के कांको मठ के पीछे कतरी नदी की ओर जाने वाले मार्ग में रह रहे आदिवासी परिवार के 70 वर्षीय वृद्ध मतलू मांझी एवं उनकी बेटी लीला देवी ने बताया कि वे लोग लगभग 60-70 सालों से यहां रहकर किसी तरह से अपना जीवन गुजर बसर करते आ रहे हैं. लेकिन सुविधा के नाम पर कुछ भी नही है. बिना बिजली के ही इस भीषण गर्मी को झेलना पड़ रहा है. जैसे तैसे दिन कटता है तो खुले आसमान के नीचे सोकर रात काटनी पड़ती है मोमबत्तियां जलाकर रात बितानी पड़ती है. सामने ना कोई कुआं है, ना ही चापाकल और न ही किसी योजना का पाइपलाइन बिछा है. लगभग 200 मीटर दूरी पर बह रहे कतरी नदी का पानी पीकर प्यास बुझाना पड़ता है. इसी पानी को अन्य कामों में भी उपयोग में लाया जाता है. सामने कोई सरकारी स्कूल नहीं होने के कारण बच्चे पढ़ते भी नहीं है. स्थानीय प्रतिनिधियों के द्वारा अपने फायदे के लिए सभी का वोटर कार्ड तो बनवा दिया गया है. लेकिन 40-45 लोगों में से केवल 9-10 लोगों को ही राशन मिलता है. किसी को भी सरकारी आवास का लाभ नहीं मिला है. सभी मिट्टी के कच्चे मकान बनाकर जैसे तैसे रहने को विवश हैं. परिजन बताते हैं कि अब तक हुए सभी चुनावों में वे लोग वोट देकर सरकार में और देश तथा राज्य के विकास में अपनी भागीदारी निभाते आ रहे हैं. बताया कि कई बार बिजली, पानी व सरकारी आवास को लेकर स्थानीय मुखिया को भी बोला गया है. लेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला है. रात को जब बाहर में बच्चों के संग सोते हैं तो आसपास सियार घूमते रहता है और उसके चिल्लाने की आवाजे आती रहती है, जिससे बच्चे डर जाते हैं. लेकिन अब तो आदत सी बन चुकी है.
सवाल यह है कि आजादी के 75 साल के बाद भी यदि कोई परिवार बिजली, पानी, राशन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से महरूम है. तो न केवल यह केन्द्र सरकार व राज्य सरकार के लिए गंभीर विषय है बल्कि समाज के लिए भी चिंता का विषय है. झारखंड जैसे राज्य में जहां आदिवासी परिवारों से ही झारखंड की पहचान होती है, वहाँ दर्जनों छोटे-छोटे बच्चों के साथ आदिवासी परिवार ही घुट घुट कर जीने को विवश है. स्थानीय प्रशासन, जिला प्रशासन, पंचायत के प्रतिनिधियों, स्थानीय विधायक व सांसद को इस मामले में तत्काल संज्ञान लेकर इन आदिवासी परिवारों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में पहल करना चाहिए. चुनी हुई सरकारों का भी यह पहला दायित्व बनता है कि वह मूलभूत सुविधाओं को उपलब्ध कराने के साथ ही सभी सरकारी योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम पायदान में बैठे लोगों तक पहुंचाएं. मतलु मांझी, देवंती देवी, जिरवा देवी, गुड़िया देवी, सुगंती देवी, लक्ष्मी देवी, नंदेलाल मांझी, पूरन मांझी, बबिता देवी, रिंकू देवी, रामबली मांझी, क्रांति देवी, अजय मांझी, दीपक कुमार, महेश कुमार, लक्ष्मी कुमारी, धीरेन मांझी, बढ़न मांझी आदि दर्जनों आदिवासी परिवार यहाँ वर्षों से रह रहे हैं।
*(अरबिन्द सिन्हा*

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