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भारत के आधार कार्ड पर नेपाल में पढ़ाई कर रहे बिहार के बच्चे, ‘जन गण मन’ नहीं आता, नेपाली राष्ट्रगान फर्राटे से गाते हैं

भारत के आधार कार्ड पर नेपाल में पढ़ाई कर रहे बिहार के बच्चे, ‘जन गण मन’ नहीं आता, नेपाली राष्ट्रगान फर्राटे से गाते हैं

अररिया के सीमावर्ती मधुबनी गांव की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल; भारतीय स्कूल 17 किलोमीटर दूर, बेलाही नदी पर पुल नहीं होने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित

अररिया/भागलपुर। बिहार के अररिया जिले के भारत-नेपाल सीमावर्ती गांव में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। नरपतगंज प्रखंड के मधुबनी गांव के वार्ड नंबर 17 में रहने वाले दर्जनों भारतीय बच्चे पढ़ाई के लिए नेपाल जाने को मजबूर हैं। गांव के नजदीक भारतीय सरकारी स्कूल नहीं होने और रास्ते में बेलाही नदी पर पुल का अभाव होने के कारण बच्चों की शिक्षा सीमा पार निर्भर हो गई है। स्थिति यह है कि भारतीय नागरिक होने के बावजूद कई बच्चे नेपाली पाठ्यक्रम पढ़ रहे हैं और वहां की भाषा व संस्कृति से परिचित हो रहे हैं, जबकि उन्हें अपने देश के राष्ट्रगान और राष्ट्रीय प्रतीकों की पर्याप्त जानकारी नहीं है।

भारतीय छात्रा को नहीं आता ‘जन गण मन’, नेपाली राष्ट्रगान कंठस्थ

इस समस्या को उजागर करने वाली छात्रा रीतू कुमारी पांचवीं कक्षा में पढ़ती है। खबर में सामने आए विवरण के मुताबिक, रीतू को भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ नहीं आता, लेकिन वह नेपाल का राष्ट्रगान ‘सयौं थुँगा फूलका हामी...’ धाराप्रवाह गा लेती है। नेपाली स्कूल में पढ़ाई करने के कारण उसके अध्ययन में नेपाल के पाठ्यक्रम, इतिहास और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी जानकारियां शामिल हैं। यह स्थिति केवल एक छात्रा तक सीमित नहीं बताई जा रही है। ग्रामीणों के अनुसार, गांव के कई बच्चे इसी तरह सीमा पार स्थित स्कूलों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इससे उनकी भारतीय शैक्षणिक व्यवस्था से दूरी और भविष्य में प्रमाणपत्रों की मान्यता को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।


17 किलोमीटर दूर भारतीय स्कूल, रास्ते में बहती है बेलाही नदी

मधुबनी गांव के बच्चों के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्कूल तक पहुंचने की है। ग्रामीणों के मुताबिक, नजदीकी भारतीय प्राथमिक और मध्य विद्यालय गांव से करीब 17 किलोमीटर दूर हैं। इस रास्ते में बेलाही नदी पड़ती है, जिस पर अब तक पुल नहीं बन पाया है। नदी में पानी रहने के कारण बच्चों के लिए उसे पार करना जोखिम भरा हो जाता है। छोटे बच्चों को रोजाना इतनी लंबी दूरी तय कर स्कूल भेजना अभिभावकों के लिए मुश्किल है। ऐसे में नेपाल के नजदीकी सरकारी स्कूल उनके लिए शिक्षा का आसान विकल्प बन गए हैं।

आधार कार्ड के आधार पर नेपाल के स्कूलों में दाखिला

भारतीय स्कूलों तक पहुंचने में आने वाली परेशानियों के मुकाबले नेपाल के कुछ सरकारी स्कूल गांव के नजदीक स्थित हैं। इसी वजह से अभिभावक अपने बच्चों को सीमा पार पढ़ने भेज रहे हैं। खबर में उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नेपाली स्कूलों में भारतीय बच्चों को उनके आधार कार्ड जैसे पहचान दस्तावेजों के आधार पर प्रवेश मिल जाता है। इसके बाद बच्चे वहां की शैक्षणिक व्यवस्था और पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाई करते हैं। हालांकि, दूसरे देश में पढ़ाई करने से अपने आप किसी बच्चे की भारतीय नागरिकता समाप्त नहीं होती। लेकिन भविष्य में भारतीय विद्यालयों में प्रवेश, कक्षा के समकक्ष प्रमाणपत्र, आगे की पढ़ाई और दस्तावेजों की स्वीकार्यता जैसे सवालों पर संबंधित शिक्षा विभाग से स्पष्ट जानकारी और समाधान जरूरी है।

नेपाली पाठ्यक्रम पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य पर सवाल

ग्रामीणों की चिंता केवल राष्ट्रगान तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि बच्चों की शुरुआती शिक्षा नेपाल में होने से वे भारतीय पाठ्यक्रम, इतिहास, संविधान और सांस्कृतिक प्रतीकों से अपेक्षाकृत कम परिचित रह जाते हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब ये बच्चे आगे की पढ़ाई के लिए भारतीय विद्यालयों या महाविद्यालयों में प्रवेश लेना चाहेंगे, तब उनके नेपाली शैक्षणिक प्रमाणपत्रों की समकक्षता और मान्यता किस प्रकार निर्धारित होगी। इस संबंध में संबंधित भारतीय शिक्षा अधिकारियों की स्पष्ट नीति और मार्गदर्शन जरूरी है, ताकि बच्चों की पढ़ाई बीच में न रुके।

जनप्रतिनिधियों को आवेदन देने के बावजूद समाधान नहीं मिलने का आरोप


ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने इस समस्या को सांसद, विधायक, जिलाधिकारी और पंचायत प्रतिनिधियों के सामने कई बार उठाया है। आवेदन देने से लेकर धरना-प्रदर्शन तक किए गए, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं निकल पाया।

ग्रामीणों का कहना है कि आजादी के दशकों बाद भी सीमावर्ती गांव के बच्चों को अपने ही देश में स्कूल तक पहुंचने के लिए इतनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। उनके मुताबिक, यदि गांव के आसपास सरकारी विद्यालय की व्यवस्था हो जाए और बेलाही नदी पर पुल का निर्माण कर दिया जाए, तो बच्चों को नेपाल जाकर पढ़ने की मजबूरी से राहत मिल सकती है।

मुखिया ने जताई चिंता, प्रशासन से समाधान की मांग

गांव के मुखिया ने इस स्थिति को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि भारतीय सीमा के भीतर रहने वाले बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए नेपाल जाना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि इस समस्या से जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों को कई बार अवगत कराया गया है, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है।


मुखिया के अनुसार, स्थानीय बच्चों के सामने सीमा पार जाकर पढ़ाई करने के अलावा व्यावहारिक विकल्प सीमित हैं। नेपाली स्कूलों से प्राप्त प्रारंभिक शिक्षा प्रमाणपत्रों की भारत में स्वीकार्यता को लेकर भी अभिभावक चिंतित हैं। उन्होंने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए प्रशासन से जल्द कदम उठाने की मांग की।

प्रशासन के सामने तीन बड़ी चुनौतियां

इस पूरे मामले में स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग के सामने तीन प्रमुख मुद्दे हैं:

1. स्कूल की उपलब्धता: मधुबनी गांव के बच्चों के लिए नजदीक में भारतीय सरकारी विद्यालय की व्यवस्था करना या सुरक्षित परिवहन उपलब्ध कराना।

2. बेलाही नदी पर पुल: नदी पर आवागमन की सुरक्षित व्यवस्था विकसित करना, ताकि बच्चों और ग्रामीणों को परेशानी न हो।

3. शैक्षणिक भविष्य: नेपाल में पढ़ रहे भारतीय बच्चों के दस्तावेजों, प्रमाणपत्रों और आगे की पढ़ाई के संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश देना।

सवाल सिर्फ राष्ट्रगान का नहीं, बच्चों के भविष्य का है

अररिया के मधुबनी गांव की यह स्थिति सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की जरूरत को सामने लाती है। किसी बच्चे को अपने देश का राष्ट्रगान न आने की बात चर्चा का विषय जरूर बन सकती है, लेकिन इसके पीछे स्कूल की दूरी, नदी पर पुल का अभाव और शिक्षा तक पहुंच जैसी समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अब जरूरत है कि बिहार सरकार, जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग मामले की जांच कर वास्तविक स्थिति का आकलन करें। गांव में विद्यालय, सुरक्षित आवागमन और प्रमाणपत्रों से जुड़ी समस्याओं का समाधान किया जाए, ताकि भारतीय बच्चों को अपने ही देश में शिक्षा पाने के लिए सीमा पार जाने को मजबूर न होना पड़े।

सबसे अहम सवाल: जब भारतीय सीमा में रहने वाले बच्चों को अपने देश में स्कूल तक पहुंचने की सुविधा नहीं मिल पा रही है, तो उनकी शिक्षा और भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा? 

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