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मोहन भागवत के बिलासपुर दौरे में मीडिया OUT? सुरक्षा या कवरेज व्यवस्था पर सवाल

मोहन भागवत के दौरे में मीडिया ‘OUT’! सुरक्षा का पहरा या सवालों से दूरी? बिलासपुर में कवरेज पर क्यों लगा पहरा?

बिरकोना में RSS प्रमुख का दो दिवसीय प्रवास, पत्रकारों को दूर से करनी पड़ी कवरेज; सुरक्षा प्रोटोकॉल या आयोजकों की मीडिया नीति, जवाब किसके पास?

बिलासपुर, 22 अक्टूबर 2026। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत के बिलासपुर प्रवास के दौरान सुरक्षा व्यवस्था और मीडिया की पहुंच को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। संघ प्रमुख बिरकोना स्थित सरस्वती शिशु मंदिर आवासीय विद्यालय में दो दिवसीय प्रवास पर हैं। इस दौरान प्रांतीय पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ संगठनात्मक चर्चा प्रस्तावित है। लेकिन कार्यक्रम स्थल पर मीडिया की सीमित पहुंच ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—जब सुरक्षा के लिए पूरा इंतजाम था, तो पत्रकारों के लिए व्यवस्थित कवरेज की जगह क्यों नहीं बनाई गई? मामला किसी पत्रकार के कार्यक्रम में जबरन प्रवेश का नहीं, बल्कि मीडिया की कवरेज व्यवस्था और सूचना तक पहुंच का है। पत्रकारों को उपलब्ध स्थानों से ही तस्वीरें और दृश्य जुटाने पड़े। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि मीडिया की पहुंच सीमित रखने का फैसला किस स्तर पर लिया गया और क्या पत्रकारों को पहले से स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए थे?

सुरक्षा का हवाला, लेकिन मीडिया के लिए व्यवस्था कहां?

मोहन भागवत जैसे प्रमुख संगठनात्मक पदाधिकारी का दौरा स्वाभाविक रूप से समाचार की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। ऐसे कार्यक्रमों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखना जरूरी है, लेकिन सुरक्षा और मीडिया कवरेज के बीच संतुलन बनाना भी आयोजकों तथा संबंधित प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण होता है। यदि कार्यक्रम पूरी तरह आंतरिक था, तो मीडिया को इसकी जानकारी पहले ही दी जा सकती थी। यदि कुछ हिस्से कवरेज के लिए खुले थे, तो पत्रकारों के लिए निर्धारित स्थान, समय और आवश्यक दिशा-निर्देश उपलब्ध कराए जा सकते थे। लेकिन जब मीडिया को दूर से ही कवरेज करनी पड़े, तो सवाल उठना लाजिमी है—क्या सुरक्षा व्यवस्था के तहत मीडिया की दूरी जरूरी थी, या कवरेज की योजना में ही पत्रकारों के लिए पर्याप्त जगह नहीं रखी गई?

फिलहाल, मीडिया की पहुंच सीमित रहने के पीछे आयोजकों या सुरक्षा एजेंसियों की ओर से क्या आधिकारिक वजह बताई गई, यह स्पष्ट नहीं है। इसलिए बिना स्पष्टीकरण किसी एक पक्ष को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

दो दिन का प्रवास, कई अहम बैठकें—फिर मीडिया की भूमिका सीमित क्यों?

मोहन भागवत का बिलासपुर प्रवास बिरकोना स्थित सरस्वती शिशु मंदिर आवासीय विद्यालय में निर्धारित है। गुरुवार को उनकी मुलाकात प्रांतीय पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से होने की जानकारी है। वहीं शुक्रवार को प्रांत स्तरीय बैठक प्रस्तावित है, जिसमें संघ के प्रमुख पदाधिकारियों के शामिल होने की बात कही गई है।

प्रवास के बाद मोहन भागवत के रात में अमरकंटक एक्सप्रेस से जबलपुर रवाना होने का कार्यक्रम बताया गया है। दौरे को देखते हुए विद्यालय और आसपास के क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखी गई है।

यहां सवाल यह नहीं कि संगठन अपनी आंतरिक बैठकें मीडिया के सामने क्यों नहीं करना चाहता। सवाल यह है कि क्या कार्यक्रम की प्रकृति और मीडिया की पहुंच को लेकर पहले से स्पष्ट व्यवस्था बनाई गई थी? यदि बनाई गई थी, तो पत्रकारों को उसकी जानकारी किस तरह दी गई?

RSS जैसे बड़े संगठन से सवाल पूछना गलत कैसे?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश के प्रमुख सामाजिक-संगठनात्मक संगठनों में शामिल है। उसके सरसंघचालक का किसी शहर में आगमन, संगठनात्मक बैठकें और पदाधिकारियों के साथ संवाद सार्वजनिक रुचि के विषय हैं।

पत्रकारों का काम केवल कैमरा चलाना या तस्वीरें लेना नहीं है। उनकी जिम्मेदारी कार्यक्रम से जुड़ी जानकारी, संगठन की गतिविधियों और जनता के सवालों को सामने लाना भी है।

बेशक, हर कार्यक्रम सार्वजनिक नहीं होता और आयोजकों को आंतरिक बैठकों की सीमाएं तय करने का अधिकार है। लेकिन मीडिया के लिए क्या खुला है, क्या प्रतिबंधित है और किन नियमों के तहत कवरेज होगी—इस बारे में स्पष्टता रहे, तो अनावश्यक विवाद से बचा जा सकता है। आखिर सवाल पूछना और कवरेज करना पत्रकारों का काम है, तो मीडिया की व्यवस्था स्पष्ट करना आयोजकों की जिम्मेदारी क्यों नहीं होनी चाहिए?

फाइल फोटो

कैमरे दूर रहे, तो क्या सवाल भी दूर रहेंगे?

बिलासपुर में मीडिया की सीमित पहुंच ने आयोजकों की मीडिया नीति पर सवाल जरूर खड़े किए हैं। हालांकि, केवल दूर से कवरेज होने के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि पत्रकारों को जानबूझकर बाहर रखा गया या सवालों से बचने के लिए ऐसा किया गया।

इसके बावजूद कुछ सवालों के जवाब जरूरी हैं:

- क्या मीडिया की पहुंच सीमित रखने का फैसला सुरक्षा एजेंसियों ने लिया था या आयोजकों ने?

- क्या पत्रकारों को कार्यक्रम से पहले कवरेज संबंधी दिशा-निर्देश दिए गए थे?

- क्या अधिकृत मीडिया के लिए कोई निर्धारित कवरेज प्वाइंट बनाया गया था?

- क्या प्रांतीय बैठक और अन्य गतिविधियों के बाद मीडिया से बातचीत की कोई व्यवस्था थी?

- क्या आयोजक स्पष्ट करेंगे कि पत्रकारों को कार्यक्रम स्थल से दूर रहकर कवरेज क्यों करनी पड़ी?

इन सवालों का जवाब सामने आने से स्थिति स्पष्ट हो सकती है और भविष्य में ऐसी व्यवस्थाओं को बेहतर बनाया जा सकता है।

सुरक्षा जरूरी, लेकिन संवाद से दूरी क्यों?

किसी भी बड़े आयोजन में सुरक्षा सर्वोपरि है। विशेष व्यक्तियों के दौरे पर प्रवेश, आवाजाही और कवरेज को नियंत्रित करना सुरक्षा प्रोटोकॉल का हिस्सा हो सकता है। लेकिन सुरक्षा के साथ मीडिया प्रबंधन की योजना भी बनाई जा सकती है, ताकि पत्रकार निर्धारित नियमों के भीतर रहकर अपना काम कर सकें।

बिलासपुर में मोहन भागवत का दो दिवसीय प्रवास संगठनात्मक गतिविधियों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। ऐसे में मीडिया की सीमित पहुंच को लेकर उठे सवालों पर आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आना चाहिए।

अब बड़ा सवाल यही है—क्या बिरकोना में मीडिया की दूरी केवल सुरक्षा प्रोटोकॉल का हिस्सा थी, या मीडिया कवरेज की व्यवस्था में संवाद की कमी रह गई?

जवाब आयोजकों और संबंधित प्रशासन के स्पष्टीकरण से ही साफ होगा। फिलहाल, कैमरों की दूरी से ज्यादा चर्चा उस व्यवस्था की है, जिसने पत्रकारों को दूर से कवरेज करने पर मजबूर किया।

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