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दो रावण दहन, दो हादसे, फिर कार्रवाई पर खामोशी! ‘मेवा-सदन संस्कृति’ के आगे नतमस्तक है प्रशासन?

दो रावण दहन, दो हादसे, फिर कार्रवाई पर खामोशी! ‘मेवा-सदन संस्कृति’ के आगे नतमस्तक है प्रशासन?


बिलासपुर में पुलिस ग्राउंड और साइंस कॉलेज मैदान में आतिशबाजी के दौरान हादसों से सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल; कांग्रेस नेता अंकित गौरहा ने जांच, ठेका शर्तों की समीक्षा और जवाबदेही तय करने की मांग की

बिलासपुर, छत्तीसगढ़। विजयादशमी पर बुराई के प्रतीक रावण का दहन किया गया, लेकिन बिलासपुर में दो अलग-अलग आयोजनों के दौरान आतिशबाजी से जुड़े हादसों ने सार्वजनिक कार्यक्रमों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस ग्राउंड में रावण दहन के दौरान दो पत्रकारों राकेश मिश्रा और शेख अशलम सहित कुछ लोगों के झुलसने की खबर सामने आई। वहीं, बेलतरा विधानसभा क्षेत्र के साइंस कॉलेज मैदान में भी आतिशबाजी के दौरान रॉकेट फटने से अफरा-तफरी की स्थिति बनने की जानकारी सामने आई है।

इन घटनाओं के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सार्वजनिक आयोजनों में सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं सुनिश्चित किए गए? हादसों के बाद जांच और जवाबदेही को लेकर क्या कदम उठाए गए हैं?

साइंस कॉलेज मैदान

जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की मौजूदगी में सुरक्षा पर सवाल

साइंस कॉलेज मैदान में आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री तोखन साहू मौजूद थे। वहीं, पुलिस ग्राउंड के आयोजन में बिलासपुर विधायक अमर अग्रवाल, महापौर पूजा विधानी, कलेक्टर, एसपी, पत्रकारों और बड़ी संख्या में आम नागरिकों ने भाग लिया था।

ऐसे महत्वपूर्ण आयोजनों में जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठ अधिकारियों, पत्रकारों और आम नागरिकों की मौजूदगी के बावजूद आतिशबाजी से जुड़े हादसे सामने आना सुरक्षा प्रबंधन की समीक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

क्या आतिशबाजी के लिए सुरक्षित दूरी निर्धारित की गई थी? क्या भीड़ को नियंत्रित करने के पर्याप्त इंतजाम थे? क्या आयोजन से पहले सुरक्षा मानकों का निरीक्षण किया गया था? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।

हादसे हुए, लेकिन कार्रवाई कहां? प्रशासन से जवाब मांग रहे सवाल

दो अलग-अलग स्थानों पर घटनाओं की जानकारी सामने आने के बाद जिला प्रशासन की जवाबदेही को लेकर सवाल उठ रहे हैं। अब तक जांच और कार्रवाई की आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं होने पर यह जानने की मांग की जा रही है कि संबंधित आयोजकों और ठेकेदारों की जिम्मेदारी किस तरह तय की गई है।

कांग्रेस नेता अंकित गौरहा ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि सार्वजनिक आयोजनों में आम नागरिकों, पत्रकारों और जनप्रतिनिधियों की जान जोखिम में पड़ना गंभीर विषय है। ऐसी घटनाओं को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने मांग की कि प्रशासन स्पष्ट करे कि सुरक्षा मानकों के पालन की जिम्मेदारी किसकी थी और यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है, तो उसके लिए कौन जवाबदेह है।

24 लाख रुपये के टेंडर से भुगतान तक जांच की मांग

बेलतरा के साइंस कॉलेज मैदान में आयोजन से संबंधित बताए जा रहे 24 लाख रुपये के टेंडर और पुलिस ग्राउंड के आयोजन से जुड़े ठेके की शर्तों की जांच की मांग भी उठाई गई है।

जांच के दायरे में इन बिंदुओं को शामिल किए जाने की मांग की जा रही है:

  • टेंडर में सुरक्षा व्यवस्था और आतिशबाजी को लेकर क्या शर्तें निर्धारित थीं?
  • क्या आयोजन के दौरान उन शर्तों का पालन किया गया?
  • सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी की जिम्मेदारी किस अधिकारी, संस्था या ठेकेदार की थी?
  • क्या आयोजन से पहले सुरक्षा संबंधी निरीक्षण और आवश्यक अनुमतियां सुनिश्चित की गई थीं?
  • यदि किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो क्या नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी?
  • भुगतान से संबंधित दस्तावेजों और प्रक्रिया की नियमों के अनुरूप समीक्षा हुई है या नहीं?

अंकित गौरहा की मांग है कि जांच निष्पक्ष हो और यदि किसी की जिम्मेदारी सामने आती है, तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए। जांच लंबित होने की स्थिति में भुगतान प्रक्रिया की समीक्षा भी लागू नियमों और अनुबंध की शर्तों के अनुसार की जानी चाहिए।

क्या ‘मेवा-सदन संस्कृति’ के कारण कार्रवाई पर चुप्पी?

इस मामले में राजनीतिक प्रभाव और ठेका प्रक्रिया से जुड़े लोगों को कथित संरक्षण दिए जाने की आशंकाएं भी उठाई जा रही हैं। सवाल यह है कि क्या प्रभावशाली लोगों से जुड़े आयोजनों में जवाबदेही तय करने का तरीका अलग होता है?

हालांकि, राजनीतिक संरक्षण या दबाव के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए दस्तावेजी साक्ष्य और निष्पक्ष जांच आवश्यक है। फिलहाल प्रशासन की ओर से जांच और कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है, ताकि किसी भी प्रकार की अटकलों पर विराम लग सके।

अंकित गौरहा ने मांग की कि दोनों घटनाओं की जांच की स्थिति सार्वजनिक की जाए, ठेका प्रक्रिया और सुरक्षा मानकों की समीक्षा हो तथा दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ बिना किसी दबाव के कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

जनता की सुरक्षा से बड़ा कोई ठेका नहीं

रावण दहन जैसे सार्वजनिक आयोजन भारतीय परंपरा, उत्सव और सामूहिक उल्लास के प्रतीक हैं। लेकिन उत्सव की चमक के बीच लोगों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आतिशबाजी से जुड़े हादसे यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या आयोजन की भव्यता के साथ सुरक्षा व्यवस्था को भी उतनी ही प्राथमिकता दी गई थी?

दो अलग-अलग स्थानों पर हादसों की खबर सामने आने के बाद प्रशासन से अपेक्षा है कि वह तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करे, जांच की प्रगति सार्वजनिक करे और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए।

अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं: क्या दोनों आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था की निष्पक्ष जांच होगी? क्या 24 लाख रुपये के बताए जा रहे टेंडर सहित संबंधित ठेका दस्तावेजों की समीक्षा की जाएगी? और क्या जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जानकारी जनता के सामने रखी जाएगी?


इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि सार्वजनिक आयोजनों में जनता की सुरक्षा को कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है।

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