दीयों की रोशनी में छिपते सवाल: मोदी के जन्मदिन से लेकर बिलासपुर की गलियों तक—जश्न बड़ा या जनता के मुद्दे?
बिलासपुर/नई दिल्ली। 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर देशभर में ‘आशीर्वाद का दिया’ कार्यक्रम आयोजित किए गए। भाजपा ने इसे सेवा और शुभकामना से जोड़ा और देशभर में 500 से अधिक प्रमुख स्थानों पर कार्यक्रमों की योजना की गई। प्रधानमंत्री ने भी ‘आशीर्वाद का दिया’ को लोगों के स्नेह और आशीर्वाद की अभिव्यक्ति बताया।
लेकिन सवाल यह नहीं कि दीया क्यों जलाया गया? सवाल यह है कि जिस देश में एक तरफ जन्मदिन के जश्न की रोशनी है, वहीं दूसरी तरफ जनता के रोजमर्रा के सवाल कितने उजाले में हैं?
बिहार में करीब 50 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हैं। 15 जिलों के लाखों परिवार बाढ़ की मार झेल रहे हैं। प्रशासन की ओर से राहत शिविर, सामुदायिक रसोई और नावें लगाई गई हैं, लेकिन प्रभावित परिवारों के सामने घर, फसल, भोजन, रोजगार और सामान्य जिंदगी वापस पाने की चुनौती है।
और यही से सवाल उठता है—देश में जश्न मनाने का अधिकार है, लेकिन क्या सवाल पूछने का अधिकार भी उतनी ही ताकत से बचा है?
एक तरफ लाखों दीये, दूसरी तरफ लाखों परिवारों की चिंता
बिहार की बाढ़ सिर्फ एक राज्य की कहानी नहीं है। देश में हर क्षेत्र की अपनी समस्या है।
तो क्या विकास सिर्फ बड़े प्रोजेक्ट का नाम है या उस सड़क का भी नाम है जिस पर रोज आम आदमी चलता है?
छत्तीसगढ़ भी इस बहस से बाहर नहीं है
अब अपने छत्तीसगढ़ को ही देखिए।
राज्य में सड़क, रेल, एयरपोर्ट, बिजली, स्वास्थ्य और औद्योगिक ढांचे में कई परियोजनाएं आगे बढ़ी हैं। केंद्र सरकार के अनुसार छत्तीसगढ़ में 2014 के बाद 3,389 किलोमीटर से अधिक राष्ट्रीय राजमार्ग बनाए गए हैं और कई रेल परियोजनाओं पर काम चल रहा है। बिलासपुर एयरपोर्ट को ऑल-वेदर ऑपरेशन के लिए अपग्रेड करने की मंजूरी भी मिली है।
बिलासपुर में स्वास्थ्य ढांचे के लिए NTPC की CSR परियोजनाओं के तहत करीब 7.19 करोड़ रुपये के काम भी हुए हैं।
यानी यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि विकास हुआ ही नहीं। विकास के कई काम हुए हैं और कई बड़े प्रोजेक्ट चल रहे हैं।
लेकिन जनता का सवाल यह है—
बड़ा प्रोजेक्ट बन रहा है, ठीक है… लेकिन मोहल्ले की छोटी सड़क कब बनेगी?
रेलवे लाइन बढ़ रही है, ठीक है… लेकिन आम यात्री की सुविधाएं कब बढ़ेंगी?
एयरपोर्ट का विस्तार हो रहा है, अच्छी बात है… लेकिन आम आदमी के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की स्थानीय व्यवस्था कितनी मजबूत हुई?
यही फर्क है कागज पर विकास और जमीन पर महसूस होने वाले विकास के सवाल में।
बिलासपुर का सवाल—हाईवे भी चाहिए, लेकिन गली की नाली भी
बिलासपुर में इस साल मानसून के दौरान बिजली वितरण व्यवस्था और जलभराव को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में भी मामला पहुंचा। न्यायालय के समक्ष राज्य सरकार ने बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए कई कदमों की जानकारी दी, जबकि नगर निगम ने बारिश के दौरान जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति से निपटने के लिए फ्लड कंट्रोल सेल बनाने की जानकारी दी।
तो सवाल सीधा है—
जब शहर में फ्लड कंट्रोल सेल की जरूरत पड़ती है, तो क्या हम यह सवाल नहीं पूछेंगे कि आखिर हर साल जलभराव की नौबत क्यों आती है?
नाली की सफाई बारिश से पहले क्यों नहीं?
सड़क बनने के बाद पानी निकासी की व्यवस्था क्यों नहीं?
और जब बिलासपुर-उरगा राष्ट्रीय राजमार्ग जैसा बड़ा प्रोजेक्ट निर्माणाधीन है, तो उसके आसपास सुरक्षा और यातायात व्यवस्था को लेकर भी प्रशासन को अलग से निर्देश देने पड़ते हैं।
मतलब साफ है—विकास हो रहा है, लेकिन विकास के साथ सवाल भी खत्म नहीं होते।
कोरोना काल भूले नहीं हैं लोग
अब थोड़ा पीछे चलते हैं।
2020 का कोरोना काल।
लॉकडाउन लगा। बाजार बंद हुए। दुकानें बंद हुईं। कारखाने बंद हुए। लाखों लोग रोजगार और आय के संकट में आए। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने उस समय आकलन किया था कि भारत में लॉकडाउन से 36.4 करोड़ या उससे अधिक श्रमिक काम के घंटे, रोजगार या आय में कटौती के जोखिम में थे।
मजदूरों के पलायन की तस्वीरें देश ने देखीं।
आज सालों बाद हम आगे बढ़ चुके हैं, अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे में कई बदलाव हुए हैं। लेकिन सवाल यह है—
क्या कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित परिवार पूरी तरह संभल गए?
क्या हर बच्चे की पढ़ाई का नुकसान पूरा हो गया?
क्या हर छोटा व्यापारी उस झटके से पूरी तरह बाहर आ गया?
इन सवालों का जवाब हर परिवार के लिए एक जैसा नहीं हो सकता।
फिर आई नोटबंदी—लाइनें आज भी याद हैं
8 नवंबर 2016।
नोटबंदी।
₹500 और ₹1,000 के नोट बंद किए गए। सरकार ने इसके पीछे काले धन, नकली नोट और आतंक वित्तपोषण जैसी समस्याओं से निपटने के उद्देश्य बताए थे।
लेकिन बाद में RBI की 2017-18 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, नोटबंदी के समय चलन में मौजूद ₹15.41 लाख करोड़ के पुराने नोटों में से करीब ₹15.31 लाख करोड़ यानी 99.3 प्रतिशत वापस बैंकिंग प्रणाली में लौट आए।
तो सवाल पूछना गलत है क्या?
अगर 99.3 प्रतिशत पैसा वापस बैंकिंग सिस्टम में आ गया, तो नोटबंदी से मिले दूसरे लाभों का वास्तविक हिसाब जनता के सामने कितनी स्पष्टता से रखा गया?
यह सवाल नोटबंदी का समर्थन या विरोध नहीं है।
यह हिसाब मांगने का सवाल है।
क्योंकि लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना सरकार का विरोध नहीं होता।
और आज का सवाल—बेरोजगार युवा किस कतार में खड़ा है?
आज देश में सड़कें बन रही हैं, रेल लाइनें बढ़ रही हैं, डिजिटल भुगतान बढ़ा है, नए हाईवे बन रहे हैं और कई क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा मजबूत हुआ है।
लेकिन उसी देश का युवा पूछता है—
नौकरी कहां है?
डिग्री हाथ में है।
फॉर्म भरता है।
फीस देता है।
परीक्षा देता है।
परिणाम का इंतजार करता है।
फिर भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं।
फिर परीक्षा स्थगित होती है।
फिर नई भर्ती का इंतजार।
और फिर वही सवाल—
“सरकार जी, नौकरी कब?”
हर राज्य की अपनी कहानी, लेकिन सवाल लगभग वही
उत्तर प्रदेश में बाढ़, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान और शहरी प्रदूषण जैसे मुद्दे हैं।
बिहार में इस समय बाढ़ सबसे बड़ा मानवीय संकट है—करीब 50 लाख लोग प्रभावित बताए गए हैं।
झारखंड में आदिवासी क्षेत्र, खनन, रोजगार, जंगल-जमीन और विस्थापन के सवाल हैं।
ओडिशा में आदिवासी विकास, चक्रवात, खनन और तटीय इलाकों की सुरक्षा के सवाल हैं।
पश्चिम बंगाल में बाढ़, रोजगार, उद्योग और राजनीतिक टकराव जैसे मुद्दे सार्वजनिक बहस में हैं।
असम और पूर्वोत्तर में बाढ़, भूस्खलन, सीमावर्ती क्षेत्र और बुनियादी ढांचे की चुनौती है।
मणिपुर में सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता का सवाल लंबे समय से महत्वपूर्ण बना हुआ है।
सिक्किम, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पहाड़ी आपदाएं, भूस्खलन, सड़कें, पर्यटन और ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिम हैं।
राजस्थान में पानी और कृषि बड़ा मुद्दा है।
गुजरात में भी कुछ क्षेत्रों में बारिश की कमी और कृषि संकट को लेकर सवाल उठे हैं।
महाराष्ट्र में एक तरफ भारी बारिश और शहरी जलभराव, दूसरी तरफ कुछ क्षेत्रों में कृषि और सूखे की चिंता है।
कर्नाटक में पानी, बिजली, खेती और शहरी बुनियादी ढांचा बहस का हिस्सा हैं।
तमिलनाडु में पानी, कावेरी और कृषि का सवाल है।
केरल में बिजली की मांग और आपूर्ति का दबाव सामने आया है।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पानी, कृषि, रोजगार और शहरी विकास के सवाल हैं।
पंजाब में किसान, कृषि, पानी, रोजगार और नशे से जुड़े मुद्दे चर्चा में हैं।
हरियाणा में किसान, पानी, रोजगार और औद्योगिक विकास के सवाल हैं।
मध्य प्रदेश में शिक्षा, रोजगार, किसान और शहरी बुनियादी ढांचा महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
और छत्तीसगढ़ में भी किसान, आदिवासी क्षेत्र, रोजगार, खनन, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और शहरी सुविधाओं को लेकर जनता के अपने सवाल हैं।
यानी समस्या सिर्फ दिल्ली की नहीं।
समस्या देश के हर जिले की अपनी-अपनी है।
लेकिन नेता का जन्मदिन आते ही शहर का चेहरा बदल जाता है?
यहीं से एक और सवाल निकलता है।
प्रधानमंत्री का जन्मदिन हो—
दीये।
पोस्टर।
बैनर।
सोशल मीडिया अभियान।
शुभकामना संदेश।
सेवा कार्यक्रम।
रक्तदान।
हवन।
रैलियां।
कार्यक्रम।
और फिर विधायक का जन्मदिन हो—
सड़क के दोनों तरफ बड़े-बड़े होर्डिंग।
मंत्री का जन्मदिन हो—
चौराहे पर शुभकामना पोस्टर।
स्थानीय नेता का जन्मदिन हो—
कई जगह केक।
कार्यकर्ता जमा।
माइक।
डीजे।
काफिला।
सड़क पर भीड़।
कहीं-कहीं यातायात प्रभावित।
और शहर जान जाता है—
आज किसी नेता का जन्मदिन है।
अब सवाल यह है—
आम आदमी करे तो अपराध क्यों?
अगर कोई आम नागरिक अपने दोस्त का जन्मदिन मनाने के लिए सड़क किनारे केक काट दे, भीड़ जुट जाए, यातायात प्रभावित हो जाए, तेज आवाज में डीजे बजाए, बिना अनुमति पोस्टर लगा दे—तो क्या पुलिस कार्रवाई नहीं करेगी?
बिल्कुल करेगी, अगर कानून या स्थानीय नियमों का उल्लंघन हुआ है।
लेकिन फिर सवाल यहीं है—
वही नियम नेता के जन्मदिन पर भी उसी तरह लागू होते हैं या नहीं?
अगर सड़क सार्वजनिक है तो—
सड़क किसकी है?
अगर फुटपाथ जनता का है तो—
होर्डिंग किस अधिकार से?
अगर यातायात बाधित करना नियम के खिलाफ है तो—
बड़ा काफिला होने पर नियम बदल जाता है क्या?
अगर बिना अनुमति पोस्टर लगाना अपराध या नगर निकाय के नियमों का उल्लंघन है तो—
नेता के नाम का पोस्टर लगते ही अनुमति की जरूरत खत्म हो जाती है क्या?
अगर आम आदमी सड़क पर जश्न मनाए और उस पर FIR हो सकती है, तो—
राजनीतिक प्रभाव वाले आयोजन में वही कानून किस तरह लागू होता है?
यह किसी एक पार्टी का सवाल नहीं होना चाहिए।
कांग्रेस हो, भाजपा हो, आप हो, सपा हो, बसपा हो या कोई भी दल—कानून अगर आम आदमी के लिए है तो जनप्रतिनिधि और राजनीतिक कार्यकर्ता भी उसी कानून के दायरे में होने चाहिए।
जन्मदिन मनाइए, लेकिन शहर को बंधक बनाकर?
यहां असली सवाल जन्मदिन मनाने का विरोध नहीं है।
जन्मदिन मनाइए।
केक काटिए।
मिठाई बांटिए।
गरीबों को खाना खिलाइए।
रक्तदान कीजिए।
पेड़ लगाइए।
अस्पताल में मरीजों की मदद कीजिए।
स्कूल में बच्चों को किताबें दीजिए।
बाढ़ पीड़ितों तक राहत पहुंचाइए।
किसानों की मदद कीजिए।
युवाओं के लिए रोजगार शिविर लगाइए।
लेकिन सवाल यह है—
क्या जन्मदिन की खुशी जनता की परेशानी से बड़ी होनी चाहिए?
एक दिन नेता के नाम, बाकी 364 दिन जनता के नाम?
राजनीति में नेता जरूरी हैं।
सरकार जरूरी है।
विपक्ष जरूरी है।
जनप्रतिनिधि जरूरी हैं।
लेकिन सबसे जरूरी है—
जनता।
क्योंकि विधायक जनता के वोट से विधायक है।
मंत्री जनता के प्रतिनिधि के रूप में मंत्री है।
सांसद जनता के वोट से सांसद है।
प्रधानमंत्री जनता के लोकतांत्रिक जनादेश से प्रधानमंत्री हैं।
तो फिर जनता का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण होना चाहिए।
विकास हुआ है—लेकिन क्या हर नागरिक तक पहुंचा?
आज भारत में हाईवे हैं।
एक्सप्रेसवे हैं।
वंदे भारत ट्रेनें हैं।
डिजिटल पेमेंट है।
मोबाइल इंटरनेट है।
एयरपोर्ट का विस्तार है।
रेलवे विद्युतीकरण में बड़ी प्रगति हुई है।
आर्थिक और डिजिटल ढांचे में बदलाव हुए हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार मार्च 2025 तक रेल नेटवर्क 69,439 रूट किलोमीटर तक पहुंच चुका था और अक्टूबर 2025 तक लगभग 99.1 प्रतिशत नेटवर्क का विद्युतीकरण हो चुका था।
छत्तीसगढ़ में भी बड़े सड़क और रेल प्रोजेक्ट चल रहे हैं। बिलासपुर-उरगा हाईवे और बिलासपुर-उस्लापुर–पेंड्रा रोड रेल परियोजना जैसे काम इसका उदाहरण हैं।
इन उपलब्धियों को नकारना भी सही नहीं होगा।
लेकिन विकास की असली परीक्षा तब होती है जब—
गांव का बच्चा स्कूल में पढ़ सके,
गरीब का इलाज हो सके,
युवा को रोजगार मिल सके,
किसान अपनी फसल का उचित मूल्य पा सके,
शहर में बारिश का पानी घर में न घुसे,
सड़क पर गड्ढा दुर्घटना का कारण न बने,
महिला सुरक्षित महसूस करे,
और आम आदमी को अपना काम कराने के लिए महीनों दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें।
दीया जलने दीजिए… लेकिन सवाल भी जलते रहने दीजिए
प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर 1.25 लाख दीपों से बिलासपुर में भी ‘आशीर्वाद का दिया’ कार्यक्रम हुआ।
यह आयोजन हुआ—लोग शामिल हुए—शुभकामनाएं दी गईं।
लेकिन बिलासपुर के लिए एक दूसरा सवाल भी उतना ही जरूरी है—
क्या अगले साल तक शहर की जलभराव वाली समस्या कम होगी?
क्या सरकारी स्कूलों में सुविधाएं बेहतर होंगी?
क्या युवाओं को स्थानीय रोजगार मिलेगा?
क्या अस्पतालों में मरीजों की परेशानी कम होगी?
क्या सड़क और नाली का काम बारिश से पहले पूरा होगा?
क्या जनता की शिकायत पर अधिकारी उतनी ही तेजी से पहुंचेंगे, जितनी तेजी से जन्मदिन के कार्यक्रमों की तैयारी होती है?
यही सवाल पूरे छत्तीसगढ़ का भी है।
और यही सवाल पूरे भारत का भी।
सबसे बड़ा सवाल: नेता का जन्मदिन महत्वपूर्ण या जनता की रोज की जिंदगी?
किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री या विधायक के जन्मदिन पर कार्यक्रम करना गलत है या सही—इसका फैसला जनता और आयोजकों पर छोड़ा जा सकता है।
लेकिन कानून का पैमाना एक होना चाहिए।
नेता के लिए अलग सड़क और आम आदमी के लिए अलग सड़क नहीं।
नेता के पोस्टर के लिए अलग नियम और आम नागरिक के पोस्टर के लिए अलग नियम नहीं।
नेता की भीड़ के लिए अलग यातायात व्यवस्था और आम नागरिक की भीड़ के लिए अलग कानून नहीं।
और सबसे जरूरी—
सरकार से सवाल पूछने वाले नागरिक को दुश्मन समझना लोकतंत्र नहीं हो सकता।
क्योंकि लोकतंत्र में सिर्फ “वाह-वाह” सुनना आसान है।
मुश्किल काम है—
“क्यों?” पूछना।
क्यों सड़क टूटी?
क्यों स्कूल में शिक्षक नहीं?
क्यों अस्पताल में सुविधा नहीं?
क्यों किसान परेशान?
क्यों युवा बेरोजगार?
क्यों बाढ़ हर साल आती है?
क्यों शहर हर बारिश में डूबता है?
क्यों किसी काम में वर्षों लगते हैं?
क्यों आम आदमी पर नियम तुरंत लागू होता है?
और अगर किसी नेता के जन्मदिन पर शहर पोस्टरों से भर सकता है, सड़क पर जश्न हो सकता है, हजारों लोग जमा हो सकते हैं—
तो आम नागरिक के लिए वही अधिकार, वही नियम और वही कानून क्यों नहीं?
सवाल प्रधानमंत्री के जन्मदिन का नहीं है। सवाल उस लोकतंत्र का है, जिसमें जन्मदिन हर किसी का निजी उत्सव हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक जगह, सरकारी संसाधन और कानून—किसी एक व्यक्ति के नहीं, पूरे जनता के होते हैं।
दीये जलते रहें… जश्न भी होते रहें… लेकिन उनके बीच बिहार के बाढ़ पीड़ितों की आवाज, छत्तीसगढ़ के गांवों की आवाज, बिलासपुर की गलियों की आवाज और देश के बेरोजगार युवा की आवाज दबनी नहीं चाहिए।











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