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अरपा कोलवाशरी परियोजना की जनसुनवाई बनी विवादित – ग्रामीणों ने उठाए 13 गंभीर सवाल

अरपा कोलवाशरी परियोजना की जनसुनवाई बनी विवादित – ग्रामीणों ने उठाए 13 गंभीर सवाल

सिपत–मस्तूरी क्षेत्र में प्रस्तावित कोल वाशरी के ख़िलाफ़ 13-सूत्रीय आपत्तिपत्र; “औपचारिक जनसुनवाई” पर लोगों का बहिष्कार

बिलासपुर | 25 अगस्त 2025

एनटीपीसी के राखड़ डैम, धूल और दूषित जल की मार पहले से झेल रहे सिपत–मस्तूरी क्षेत्र के ग्रामीणों ने रलिया–भिलाई में आयोजित जनसुनवाई का सामूहिक बहिष्कार करते हुए प्रस्तावित कोल वाशरी के विरुद्ध तीखा विरोध दर्ज कराया। लोगों ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने जनभावनाओं को नज़रअंदाज़ कर केवल औपचारिकता निभाने के लिए सुनवाई की खानापूरी की, जबकि प्रभावित समुदाय की प्राथमिक चिंताओं—स्थान, भाषा, स्वास्थ्य, कृषि, रोज़गार और आवागमन—पर कोई ठोस उत्तर उपलब्ध नहीं कराया गया।

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ग्रामीण प्रतिनिधियों ने विस्तारपूर्वक 13 बिंदुओं का आपत्तिपत्र प्रस्तुत करते हुए जनसुनवाई को निरस्त करने और नियमानुसार पुनः उसी स्थल/गाँव में आयोजित करने की माँग की, जहाँ भूमि अधिग्रहण/क्रय हुआ है। लोगों का कहना है कि परियोजना की प्रक्रिया पारदर्शी, भागीदारीपूर्ण और स्थानीय भाषा में समझने योग्य होनी चाहिए, अन्यथा यह जन-सहमति (social licence) के मूल सिद्धांत पर ही आघात है।

प्रमुख आपत्तियाँ (13 बिंदु)

1. जनसुनवाई स्थल पर आपत्ति – सुनवाई प्रभावित गाँव से दूर और रेल पटरी के दूसरी ओर आयोजित की गई, जिससे वास्तविक हितधारकों की पहुँच बाधित हुई। माँग: प्रस्तावित वाशरी की भूमि के पास पुनः जनसुनवाई हो।

2. भाषाई पारदर्शिता का अभाव – परियोजना संबंधी विवरण हिंदी/स्थानीय भाषा में उपलब्ध नहीं; अंग्रेज़ी सामग्री से ग्रामीण समुदाय प्रक्रिया को समझ ही नहीं सका।

3. रोज़गार संबंधी भ्रम – नौकरी के वादों पर ठोस जानकारी शून्य: कुल पद कितने, श्रेणी क्या, अस्थायी/स्थायी स्थिति, योग्यता—सब अस्पष्ट।

4. भूमि क्रय में छल का आरोप – कृषि प्रयोजन बताकर ज़मीन खरीदी गई; उद्योग प्रयोजन स्पष्ट होता तो मुआवज़ा, नौकरी और अन्य लाभ अलग होते—ग्रामीण सहमत नहीं होते।

5. हरित क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव – परियोजना से मिट्टी की उर्वरता, फसल और मानव स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक नकारात्मक असर का ख़तरा।

6. कृषि भूमि का पहले से संकट – NTPC के कारण कृषि योग्य भूमि घट चुकी; पशु-चरागाह भी अपर्याप्त—अतिरिक्त औद्योगिक दबाव अस्वीकार्य।

7. जलस्रोतों के प्रदूषण का भय – वाशरी से निकलने वाला अपशिष्ट/गंदा पानी कुओं, तालाबों और पेयजल आपूर्ति को दूषित कर सकता है।

8. वायु प्रदूषण में वृद्धि – राखड़ व कोयला-धूल से पहले से बिगड़ी वायु गुणवत्ता और ख़राब होगी; फसल, सब्ज़ियाँ, घर-आँगन और मानव स्वास्थ्य प्रभावित।

9. कृषि उत्पादकता में गिरावट – धूल/राख की परत और रसायनिक प्रभाव से पैदावार कम होने और किसानों की वार्षिक आय घटने की आशंका।

10. पलायन का सामाजिक संकट – हर वर्ष लगभग 450 युवा-युवतियों का पलायन; उद्योगगत दबाव और प्रदूषण से यह प्रवृत्ति और तेज़ हो सकती है।

11. भारी वाहनों का आवागमन – रलिया और भिलाई के भीतर ट्रकों की आवाजाही से ग्रामीणों की दिनचर्या, आपातकालीन सेवाएँ और जन-मार्ग प्रभावित होंगे।

12. स्कूलों पर सीधा असर – प्रस्तावित क्षेत्र के निकट तीन विद्यालय; निरंतर धूल, शोर और ट्रैफ़िक से बच्चों के स्वास्थ्य व सुरक्षा पर दुष्प्रभाव।

13. स्वास्थ्य तंत्र पर दबाव – जयरामनगर का एकमात्र सरकारी अस्पताल ट्रैफ़िक/प्रदूषण से प्रभावित; उपचार तक समयबद्ध पहुँच बाधित हो सकती है।

“औपचारिकता पूरी हुई, संवाद अधूरा रहा”

ग्रामीणों के अनुसार मंच से परियोजना-पक्ष की प्रस्तुति तो हुई, पर प्रासंगिक प्रश्नों के उत्तर, आधारभूत डेटा, शमन-योजना (mitigation plan), मॉनिटरिंग की व्यवस्था और समुदाय-विशिष्ट लाभों पर संतोषजनक स्पष्टता नहीं दी गई। इस कारण लोगों ने इसे “भागीदारी से रहित, एकतरफ़ा औपचारिकता” करार दिया।

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समुदाय की माँगें

सुनवाई का पुनर्निर्धारण: प्रभावित गाँव/स्थल पर, समुचित सूचना-प्रसार के साथ।

भाषा एवं सूचना की सुलभता: DPR/परियोजना-सार, पर्यावरण/स्वास्थ्य प्रभाव आकलन, ट्रैफ़िक अध्ययन, अपशिष्ट प्रबंधन और शमन योजनाएँ हिंदी में उपलब्ध कराई जाएँ।

रोज़गार का लिखित रोडमैप: पदों की संख्या, प्रकृति (स्थायी/अस्थायी), योग्यता, प्रशिक्षण और स्थानीय युवाओं के लिए प्राथमिकता—सब कुछ लिखित गारंटी में।

भूमि क्रय की जांच: कृषि प्रयोजन बताकर क्रय के आरोपों की निष्पक्ष जाँच; यदि उद्योग प्रयोजन सिद्ध हो तो समुचित पुनर्मूल्यांकन/लाभ।

स्वास्थ्य–पर्यावरण सुरक्षा: वायु/जल गुणवत्ता की बेसलाइन और सतत मॉनिटरिंग, राख/अपशिष्ट निस्तारण की वैज्ञानिक व्यवस्था, स्कूल–अस्पताल के लिए सुरक्षा घेरा और आपदा-प्रतिक्रिया योजना।

ट्रैफ़िक प्रबंधन: भारी वाहनों के लिए वैकल्पिक मार्ग, समय-निर्धारण, स्पीड-सीमाएँ और धूल-नियंत्रण उपाय।

ग्रामीण संगठनों ने संकेत दिया है कि यदि आपत्तियों पर विचार किए बिना परियोजना प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई, तो लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीक़े से आंदोलन तेज़ किया जाएगा तथा जन-प्रतिनिधियों/प्राधिकारों से व्यापक हस्तक्षेप की मांग की जाएगी। इधर प्रशासनिक पक्ष ने कार्यवाही पूर्ण होने का उल्लेख करते हुए आपत्तियों को रिकॉर्ड पर लेने की बात कही है; अब निगाहें इस पर हैं कि लिखित आपत्तियों पर ठोस निर्णय और समयबद्ध जवाब कब और कैसे आता है।

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सिपत–मस्तूरी का मामला केवल एक औद्योगिक परियोजना का विरोध नहीं, बल्कि जीविका, स्वास्थ्य, शिक्षा, जल–जंगल–ज़मीन और स्थानीय भागीदारी के प्रश्नों का समुच्चय है। जब तक पारदर्शिता, विश्वास और ठोस शमन–लाभ योजनाओं के साथ संवाद स्थापित नहीं होता, प्रस्तावित कोल वाशरी को लेकर जनस्वीकृति मिलना चुनौतीपूर्ण दिखता है।


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