अरपा कोलवाशरी परियोजना पर ग्रामीणों का विस्फोट – राखड़ खाकर जी रहे थे, अब कोयला भी मिलेगा खाने को
अरपा कोलवाशरी परियोजना पर फूटा गुस्सा
“राखड़ खाकर जी रहे थे, अब कोयला भी मिलेगा खाने को” – ग्रामीणों का तंज
बिलासपुर। सीपत–मस्तूरी क्षेत्र में प्रस्तावित अरपा कोलवाशरी परियोजना को लेकर ग्रामीणों का गुस्सा चरम पर है। सोमवार को रलिया–भिलाई में हुई जनसुनवाई में ग्रामीणों ने साफ शब्दों में कहा कि यह सुनवाई केवल औपचारिकता है, जनता की राय का यहाँ कोई महत्व नहीं।
ग्रामीणों ने कटाक्ष करते हुए कहा – “अब तक तो हम राखड़ खाकर जी रहे थे, अब कोयला भी खाने को मिलेगा। जनसुनवाई में कितना भी विरोध कर लो, कुछ होने वाला नहीं। सब पहले से सेटिंग है, ये सिर्फ फॉर्मेलिटी है।”
पैसे के दम पर खेलते हैं उद्योगपति – ग्रामीण
गाँववालों का कहना है कि बड़े उद्योगपति केवल पैसे के बल पर खेलते हैं और गरीबों की जान से खिलवाड़ करते हैं। उनका आरोप है कि
रोजगार और विकास का झांसा दिखाकर असलियत में केवल प्रदूषण और तबाही दी जा रही है।
जब भी कोई मुसीबत आती है तो ग्रामीण प्रतिनिधियों से उम्मीद की जाती है, लेकिन वही जनप्रतिनिधि कुछ पैसों में बिककर चुप हो जाते हैं।
“हम लोग जेल तक जाने को तैयार रहते हैं गाँव वालों के हक के लिए, लेकिन नेताओं और अधिकारियों की सेटिंग के आगे आम जनता की आवाज़ दबा दी जाती है।”
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सुप्रीम कोर्ट तक जाने की चेतावनी
ग्रामीणों ने दो टूक कहा कि अगर प्रशासन और सरकार ने उनकी आपत्तियों को नज़रअंदाज़ किया तो वे अरपा कोलवाशरी परियोजना के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ेंगे। उन्होंने यहाँ तक कहा कि वे इस मामले में सरकार को भी पार्टी बनाएंगे ताकि न्यायालय में सीधा जवाब मिल सके।
जनसुनवाई के बहिष्कार, 13 बिंदुओं वाली लिखित आपत्तियों और ग्रामीणों के तीखे बयानों से साफ है कि अरपा कोलवाशरी परियोजना ग्रामीणों के लिए आस्था, आजीविका और अस्तित्व का सवाल बन चुकी है।
लोगों का आरोप है कि यह परियोजना “औद्योगिक विकास” के नाम पर गाँवों की बर्बादी और किसानों के उजड़ने का दूसरा नाम है।
ग्रामीणों का ऐलान है –
“अगर हमारी आवाज़ नहीं सुनी गई तो सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई जारी रहेगी।”


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