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कानून से ऊपर कोई नहीं — चाहे नेता ही क्यों न हो, सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, जुबान की आज़ादी पर लगाम का संकेत

कानून से ऊपर कोई नहीं — चाहे नेता ही क्यों न हो, सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, जुबान की आज़ादी पर लगाम का संकेत

दुलाल मुखर्जी| POWER NEWS 24 BHARAT

नई दिल्ली / रायपुर / बिलासपुर|

छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में अपने तीखे और कई बार विवादास्पद बयानों के लिए चर्चित छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के अध्यक्ष एवं जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी के प्रमुख अमित बघेल को देश की सर्वोच्च अदालत से बड़ा झटका लगा है।

सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज कई FIRs को लेकर दी गई अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) और FIR क्लबिंग की मांग को सिरे से खारिज करते हुए सख्त टिप्पणी की —

“अपनी जुबान पर लगाम रखें।”

FIR क्लबिंग और अग्रिम जमानत दोनों मांगें खारिज

अमित बघेल ने सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी थी कि राज्य के विभिन्न जिलों में दर्ज की गई सभी FIRs को एक साथ जोड़ दिया जाए (Clubbing of FIRs), ताकि उन्हें बार-बार गिरफ्तारी की आशंका से राहत मिल सके। साथ ही, उन्होंने अग्रिम जमानत की मांग भी की थी।

हालांकि, न्यायालय ने दोनों ही मांगों को अस्वीकार करते हुए कहा कि उनके बयानों की प्रकृति “उत्तेजक और विभाजनकारी” है, जो समाज में अशांति फैला सकती है।

न्यायालय की टिप्पणी: “अपनी जुबान पर लगाम रखें”

सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने साफ कहा —

“आप सार्वजनिक व्यक्ति हैं। इस स्थिति में आपके शब्दों का प्रभाव अधिक होता है। इसलिए ज़ुबान पर लगाम रखना सीखिए।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) का अधिकार असीमित नहीं है, और इसका प्रयोग किसी भी प्रकार से सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने या कानून-व्यवस्था को चुनौती देने के लिए नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न केवल अमित बघेल बल्कि समूचे राजनीतिक वर्ग के लिए एक चेतावनी के समान है कि सार्वजनिक जीवन में मर्यादा और जिम्मेदारी दोनों आवश्यक हैं।

यह फैसला बघेल की राजनीतिक शैली पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है, क्योंकि उनकी पहचान हमेशा से तीखे और आक्रामक बयानों से जुड़ी रही है। अब उन्हें अपनी बयानबाजी पर पुनर्विचार करने और न्यायिक प्रक्रिया में अपनी बात साबित करने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि “कानून से ऊपर कोई नहीं” — चाहे वह कितना ही बड़ा राजनीतिक नेता क्यों न हो।

यह निर्णय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं और जिम्मेदारियों पर एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल के रूप में याद किया जाएगा।

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