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मृत व्यक्ति हो गया जिंदा! कारण जान आप हो जाएंगे दंग—आखिर शासन में बैठे अधिकारी जिम्मेदार या पूरा सिस्टम जिम्मेदार? क्या न्याय मिलेगा पीड़ित को या फिर फाइलों में सिमट जाएगा यह मामला

मृत व्यक्ति हो गया जिंदा! कारण जान आप हो जाएंगे दंग—आखिर शासन में बैठे अधिकारी जिम्मेदार या पूरा सिस्टम जिम्मेदार? क्या न्याय मिलेगा पीड़ित को या फिर फाइलों में सिमट जाएगा यह मामला

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बिलासपुर। न्यायधानी बिलासपुर एक बार फिर ऐसे जमीन घोटाले से गूंज उठी है, जिसने न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं बल्कि आम लोगों की जमीन सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। मामला सिरगिट्टी क्षेत्र का है, जहां सन 1928 में मृत एक भू-स्वामी को कागजों में वर्ष 2023 में जीवित दिखाकर करोड़ों की जमीन का नामांतरण कर बेच दिया गया।

राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार, यह जमीन कौशल प्रसाद ब्राह्मण के नाम पर दर्ज थी। वर्षों तक नामांतरण नहीं होने का फायदा उठाते हुए जालसाजों ने सुनियोजित साजिश रची। सन 2023 में एक हमनाम व्यक्ति कौशल प्रसाद सूर्यवंशी को खड़ा कर उसे 46 वर्षीय जीवित व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया और फौती नामांतरण की पूरी प्रक्रिया को अंजाम दे दिया गया।

राजीव दुबे (प्रार्थी )

इतना ही नहीं, फर्जी दस्तावेज तैयार कर रमेश पांडे के नाम पावर ऑफ अटॉर्नी दी गई और फिर इस बेशकीमती जमीन को बिसाहू श्रीवास एवं कुंती श्रीवास को बेच दिया गया। यानी 95 साल पुराने मृत व्यक्ति की जमीन, नए नाम और पहचान के सहारे “कानूनी प्रक्रिया” के जरिए गायब कर दी गई।

अब बड़ा सवाल यह है कि आम नागरिक अपनी जमीन के नामांतरण के लिए महीनों दफ्तरों के चक्कर लगाता है, लेकिन यहां इतनी बड़ी प्रक्रिया बिना किसी अड़चन के पूरी कैसे हो गई? क्या यह केवल जालसाजों की चालाकी है या फिर इसमें राजस्व विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत भी शामिल है?

और हैरानी की बात यह है कि मूल रिकॉर्ड में नाम “कौशल प्रसाद ब्राह्मण” दर्ज है, जबकि नामांतरण कराने वाले का नाम “कौशल प्रसाद सूर्यवंशी” बताया जा रहा है। नाम, पहचान और विवरण में स्पष्ट अंतर होने के बावजूद रजिस्ट्रार कार्यालय में यह विसंगति कैसे नजरअंदाज हो गई, जबकि वहां हर दस्तावेज पर कई स्तर की जांच और हस्ताक्षर होते हैं?

मनीष साहू, एसडीएम, बिलासपुर

यह मामला न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि कहीं न कहीं सिस्टम में गहरी खामियां या फिर सुनियोजित गठजोड़ मौजूद है। सवाल यह भी उठता है कि जब पहले भी मोपका-चिल्हाटी क्षेत्र में करोड़ों के जमीन घोटाले सामने आ चुके हैं, तब भी ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति क्यों हो रही है?

राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो जमीन घोटालों पर सख्ती और पारदर्शिता के दावे करने वाली व्यवस्था के सामने यह घटना बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। क्या इन दावों का कोई वास्तविक असर है या फिर वे सिर्फ बयानबाजी तक सीमित हैं?

लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों से आम जनता में यह भय पैदा हो गया है कि यदि वे अपनी जमीन को लेकर सतर्क नहीं हैं, तो कोई भी व्यक्ति फर्जी दस्तावेज तैयार कर उनकी संपत्ति हड़प सकता है। इसके बाद पीड़ित को वर्षों तक न्याय के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं।

अब निगाहें प्रशासन और सरकार पर टिकी हैं कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी या नहीं। क्या दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।

क्योंकि सवाल सिर्फ एक जमीन का नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता और आम नागरिक के अधिकारों की सुरक्षा का है। 

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